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राह अभी बाकी है

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चलती हवा ये कहती है,
        
                                                    
                            
बहती नदी समझाती है,
ढलता सूरज जाते-जाते
कल की सुबह बताता है।
राहें चाहे जैसी हों,
हिम्मत नहीं गँवाना है,
रुकना तेरी रीत नहीं—
तुझको चलते जाना है॥

कभी धूप मिले इन राहों में,
कभी छाँव कहीं मिल जाती है,
कभी मंज़िल बाँहें खोल खड़ी,
कभी दूर निकलती जाती है।
हर मोड़ नया इक किस्सा है,
हर ठोकर से कुछ पाना है—
जो बीत गया, वो बीत गया,
तुझको चलते जाना है॥

कुछ हाथ मिले, फिर छूट गए,
कुछ साथ चले, फिर मुड़ भी गए,
जिनको अपना संसार कहा,
वो वक़्त के आगे बिछड़ भी गए।
जो साथ नहीं, उनकी यादों को
दिल में दीप बनाना है—
यादों में लेकिन रुकना नहीं,
तुझको चलते जाना है॥

कुछ ख़्वाब अधूरे रह जाएँ,
कुछ अपने हमसे रूठें भी,
कुछ दीप हवा में बुझ जाएँ,
कुछ आस के धागे टूटें भी।
बुझते दीपों के आगे फिर
इक दीप नया जलाना है—
अँधियारा चाहे जितना हो,
तुझको चलते जाना है॥

जब अपने ही मन की चौखट पर
हर उत्तर चुप हो जाता है,
जब भीड़ भरे इस जीवन में
मन बिल्कुल तन्हा पाता है।
उस मौन के भीतर भी फिर
संगीत नया जगाना है—
ख़ुद अपना हाथ पकड़कर फिर,
तुझको चलते जाना है॥

जो हार मिली, वो अंत नहीं,
जो जीत मिली, अभिमान नहीं,
दोनों ही राह के पड़ाव हैं,
दोनों अपनी पहचान नहीं।
कल किसने देखा है लेकिन,
आज को आज निभाना है—
जो हाथ में है, वह आज ही है,
तुझको चलते जाना है॥

पतझड़ से पेड़ों ने सीखा,
खोना भी कोई हार नहीं,
कलियाँ कहती हैं शाखों से—
हर अंत सदा दीवार नहीं।
जो आज गिरा है मिट्टी में,
कल उसको फिर उग जाना है—
हर अंत के उस पार कहीं,
तुझको चलते जाना है॥

उम्र ढले तो ढलने देना,
बालों को चाँदी होने देना,
चेहरे पर वक़्त लिखे जो भी,
मन को फिर भी ज़िंदा रखना।
साँसों की गिनती क्या करना,
हर साँस को अर्थ दिलाना है—
जब तक भीतर धड़कन है,
तुझको चलते जाना है॥

एक दिन राहें छूटेंगी,
एक दिन सफ़र भी थम जाएगा,
जो नाम लिखा है पत्थर पर,
वो नाम भी शायद मिट जाएगा।
पर पीछे अपने कर्मों का
इक उजला निशाँ छोड़ जाना है—
मंज़िल से बढ़कर सफ़र रहे,
तुझको चलते जाना है॥
— संतोष कुमार शर्मा

 
एक महीने पहले
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