विज्ञापन

प्रकृति में प्रतिबिब यथार्थ का

User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सावन में सरिता को
        
                                                    
                            
यह नहीं रहता आभास,
बिन मेघ सूख जाएगा
उसका भी कंठ।
फिर भी उन्माद में
तट की सरहद को जब
लाँघती उफान के आगोश में,
उजाड़ देती कई बस्तियाँ।

कितने भी कुशल हों नाविक,
अति-आत्मविश्वास के अहंकार में
फँसकर भँवरजाल में,
डूब जाती कश्तियाँ।

वृक्ष कितना भी हो पुरोधा,
पतझड़ में
साथ छोड़ देती हैं
एक-एक कर सारी पत्तियाँ।

रोशन दीप में
कितना भी हो घृत,
आँधी जब आती है,
बुझ जाती हैं सारी बातियाँ।

जून माह में तपन
कितना भी करे
अपनी शोहरत और स्वभाव का अभिमान,
बादल घुमड़कर बरसते हैं,
धराशायी हो जाता उसका भी गुमान।

विलासिता की प्रतिस्पर्धा के पथ पर
इठलाता इंसान,
दौलत और शोहरत पर भले करे नाज़,
उखड़ती जब साँसें,
संचित संपदा को समेटने का
समय तक नहीं देते यमराज।
-कैलाश सनोलिया
 
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3561 कविताएं

View Profile