नीब करोरी बाबा- करुणा में राम
अकबरपुर में जन्म लिया था,
धरा तुम्हें पाकर मुस्काती है।
लक्ष्मी नारायण नाम मिला था,
भक्ति नई पहचान दिलाती है।
साधु बने, पथ-पथ पर विचरे,
ममता सबको पास बुलाती है।
कंबल ओढ़े सरल वेश में,
करुणा सबको गले लगाती है।
भक्त तुम्हें हनुमत-अंश कहें तो,
श्रद्धा चरणों में झुक जाती है।
नीब करोरी, हे करुणा-सागर,
कृपा तुम्हारी राह दिखाती है।
भक्त सुनाते रेल की लीला,
आस्था मन में दीप जलाती है।
उतरे बाबा, रेल रुकी थी,
कथा यही विस्मय जगाती है।
फिर आग्रह से वापस बैठे,
रुकी रेल आगे बढ़ जाती है।
गाँव में भी स्टेशन चाहा,
लीला जनहित भी सिखाती है।
सम्मान मिले हर साधुजन को,
लीला यह संदेश सुनाती है।
नीब करोरी, हे करुणा-सागर,
कृपा तुम्हारी राह दिखाती है।
कैंची की शांत पहाड़ियों में,
रामधुन भीतर तक उतर जाती है।
हनुमान मंदिर के आँगन में,
आरती श्रद्धा की लौ जगाती है।
भूखे जन को अन्न मिले तो,
सेवा पूजा बन जाती है।
देश-विदेश से आए साधक,
करुणा भेद सभी मिटाती है।
जिसका मन जग से टूटा हो,
छाँव तुम्हारी आस जगाती है।
नीब करोरी, हे करुणा-सागर,
कृपा तुम्हारी राह दिखाती है।
राम-नाम में मन को रखकर,
चंचलता धीरे थम जाती है।
मौन तुम्हारे पास बैठूँ तो,
मन की गाँठ खुलती जाती है।
भक्त बताते, एक छुअन से,
चेतना समाधि में डूब जाती है।
सबको चाहो, सबकी सेवा,
सीख हृदय को बड़ा बनाती है।
सत्य, सुमिरन, प्रेम सँजोए,
साधना जीवन को महकाती है।
नीब करोरी, हे करुणा-सागर,
कृपा तुम्हारी राह दिखाती है।
वृंदावन में देह त्यागी थी,
स्मृति अभी भी नेह लुटाती है।
भक्त तुम्हें जब याद करें तो,
कंबल वाली छवि मुस्काती है।
जो भी पाया, बाँट सकूँ मैं,
यह इच्छा मन में उठ आती है।
किसी दुखी का हाथ पकड़ लूँ,
भक्ति कर्म में उतर आती है।
बाबा, इतना प्रेम हमें दो,
जिससे हर आँख मुस्काती है।
नीब करोरी, हे करुणा-सागर,
कृपा तुम्हारी राह दिखाती है।
— संतोष कुमार शर्मा