"जा रही हूँ आज मैं, ध्यान रखना अपना तू,"जाते-जाते वह मुझसे बोली।
बोला मैंने, "मैं नासमझ हूँ अभी, कैसे रहूँगा तुम्हारे बिना?
"मुस्कुराते हुए बोली,"मेरे जाने के बाद ज़िंदगी तुम्हें बहुत कुछ सिखाएगी,
वह सिखाएगी कि कोई तेरा नहीं,
वह सिखाएगी अपने कभी भी पराए हो सकते हैं,
वह सिखाएगी तुझे खुद के लिए जीना है।
"मैंने आँखों में आँसू लिए बोला, "मत जाओ माँ!"पर... वह नहीं मानी,हाथों से हाथ छूट गया, क्षण भर में मेरा संसार लुट गया,जिनके सीने से लगकर सोती थी, वह आज बाहर सोई पड़ी थी।
अभी तक दीवार के एक ही हिस्से को देख रही थी मैं,
जब दूसरे हिस्से को देखा तो जाना कितने दरार पड़ चुके थे उसमें,आख़िर छोड़ के जाने का दर्द तो जाने वाले को भी होता होगा ना...
ज़िंदगी अभी से इतना कुछ सिखाने लगी थी, मैंने सोचा न था,जाते-जाते लोगों ने उसे छूने भी न दिया मुझे।
यह मौत का मंज़र बड़ा ही भयानक था,
पूछना है खुदा से मुझे—न जीने दिया उसे चैन से,पर मरने भी क्यों न दिया उसे चैन से?
-ज्योति मणि