ना जाने क्यों अपनी बातों को दुनिया से छुपा लेती हूँ,
जुबाँ पे आने से पहले दिलों में दबा लेती हूँ।
ये ख्वाहिश है मेरी कि एक स्थिर नदी की भाँति ठहरना नहीं मुझे इस दुनिया में,
मैं तो समंदर की लहरों जैसा अस्तित्व चाहती हूँ।
कैसे बताऊँ इस दुनिया को कि लहरों की कोई सीमा नहीं होती,
वो तो स्वायत्त, निर्भीक और मनमानी रहती हैं।
कैसे बताऊँ इस दुनिया को कि अस्थिरता मेरी दुर्बलता नहीं,
बल्कि उस जल-तांडव को दर्शाती है जिससे दुनिया अवगत नहीं है।
रुकना नहीं मुझे उस नदी की भाँति, जिसे अपनी मंज़िलों का मालूम नहीं,
मैं तो स्वतंत्र हूँ उस समंदर की तरह, जो खुद में कितना कुछ समाए हुए है।
यह कविता स्वरचित है।
-ज्योति मणि