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मां की टूटी तस्वीर (दीपिका द्वारा)

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अचानक चटकने की आवाज़ आई
        
                                                    
                            
देखा तो तस्वीर गिरी थी।
धूल से भरी हुई
काँच में दरारें पड़ी थीं।

टूटे काँच के बीच में एक
चेहरा झलका
जो अभी भी मुस्कुरा रहा था।
उस तस्वीर से नौ यौवन झलक रहा था।
मानो, अभी आधी उम्र बाकी है।

ना जाने किसकी तस्वीर थी।
पहचान तो ना पाई मैं।
पर वो मेरी माँ जैसी दिखती थी
इतना ही याद कर पाई मैं।

मेरी माँ की शायद ये एक
ही तस्वीर थी,
क्योंकि उसने कभी तस्वीरें नहीं बनवाई,
पर उसकी इस टूटी तस्वीर ने
उसकी सारी इच्छाएँ बताईं।

प्रकाश की किरण पड़ी जब
काँचो की दरारों पर,
तो एक तीव्र रोशनी कमरे में छा गई।
जिससे मेरी माँ की तस्वीर धुँधली हो गई,
जो शायद आज की वास्तविकता है।

इन चिटके काँच की तरह
अब मेरी माँ की यादें थीं,
एक ही तो तस्वीर थी, माँ की
पर अब वो भी टूटी-बिखरी थी।
 
एक दिन पहले
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