अचानक चटकने की आवाज़ आई
देखा तो तस्वीर गिरी थी।
धूल से भरी हुई
काँच में दरारें पड़ी थीं।
टूटे काँच के बीच में एक
चेहरा झलका
जो अभी भी मुस्कुरा रहा था।
उस तस्वीर से नौ यौवन झलक रहा था।
मानो, अभी आधी उम्र बाकी है।
ना जाने किसकी तस्वीर थी।
पहचान तो ना पाई मैं।
पर वो मेरी माँ जैसी दिखती थी
इतना ही याद कर पाई मैं।
मेरी माँ की शायद ये एक
ही तस्वीर थी,
क्योंकि उसने कभी तस्वीरें नहीं बनवाई,
पर उसकी इस टूटी तस्वीर ने
उसकी सारी इच्छाएँ बताईं।
प्रकाश की किरण पड़ी जब
काँचो की दरारों पर,
तो एक तीव्र रोशनी कमरे में छा गई।
जिससे मेरी माँ की तस्वीर धुँधली हो गई,
जो शायद आज की वास्तविकता है।
इन चिटके काँच की तरह
अब मेरी माँ की यादें थीं,
एक ही तो तस्वीर थी, माँ की
पर अब वो भी टूटी-बिखरी थी।
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