तुम पूछो किनारों से—
क्यों हर कश्ती किनारे ही डूबती है?
क्यों लहरें
बीच मझधार से छूटकर भी,
किनारों तक आते-आते
अपनी सारी बेचैनी खो बैठती हैं,
और स्थिर पड़ जाती हैं?
समंदर तो
बीचों-बीच गहरा है,
हर ओर बस
मछलियों का पहरा है।
फिर भी अजीब है ये मंज़र—
जो डरते रहे गहराइयों से,
वे अक्सर किनारों पर ही हार गए।
और जो डूबने का हौसला रखते थे,
वही समंदर का राज़ जान पाए।