खाली होता बचपन
कंधों पर बस्ते भारी हैं,
हर सपना दबता जाता है।
नींद अभी आँखों में ठहरी है,
बच्चा स्कूल को जाता है।
दिन अब कॉपी में बीते हैं,
खेल कहाँ मिल पाता है।
खिड़की से वह मैदान निहारे,
मन चुपके ललचाता है।
गुड़िया-गेंदें मौन पड़ी हैं,
कोई उन्हें नहीं उठाता है।
आओ उसका हाथ थाम लें,
बचपन खाली होता जाता है।
कमरे में दुनिया सिमटी है,
मोबाइल मन बहलाता है।
दादी की हर कथा रुकी है,
कार्टून शोर मचाता है।
दोस्त सभी स्क्रीन में रहते हैं,
कोई गले न लग पाता है।
उँगली स्क्रीन टटोल रही है,
मन अपनों को बुलाता है।
आँखों में थकान उतरती है,
चेहरा फिर भी मुस्काता है।
आओ उसका हाथ थाम लें,
बचपन खाली होता जाता है।
माँ दिनभर उलझी रहती है,
पिता को काम थकाता है।
एक ही छत के नीचे सब हैं,
फिर भी घर सूना लगता है।
बातें अब छोटी होती हैं,
सन्नाटा बढ़ता जाता है।
मन में छोटी गाँठ पड़ी है,
बच्चा किससे कह पाता है।
थोड़ा समय उसे भी दे दें,
वह बस हमको पास बुलाता है।
आओ उसका हाथ थाम लें,
बचपन खाली होता जाता है।
अंक बने पहचान सभी की,
हर बच्चा घबराता है।
पहला आना शर्त बनी है,
पीछे रहना डराता है।
माँ-बाबा सपने बुनते हैं,
कोमल मन दब जाता है।
गलती करने से वह डरता है,
हर उत्तर रटता जाता है।
मिट्टी-बारिश उसे बुलाएँ,
बच्चा फिर खिल जाता है।
आओ उसका हाथ थाम लें,
बचपन खाली होता जाता है।
— संतोष कुमार शर्मा