झूठ कह रहा हूं मैं सब कुछ
वो भी हर सच को पहचान के
मुझे विसंगतियों से प्रेम हो
हां, कुछ तुझको अपना मान के
चोट लगी तो हंसी आ गई
काफ़ी अच्छा दर्द लगा
रात - रात भर नींद न आई
तेरा ख़्वाब भी साथ जगा
तू तो मेरी दुनिया है ना
मैं बस तेरा ही ख़्याल हूं
तू जवाब है आसमान का
और मैं धरती का सवाल हूं
बदल - बदल कर मौसम ख़ुद को
शायद चाहते हैं कुछ कहना
मैं तेरी यादों में रहूंगा
तू मेरे ख़्वाबों में रहना
वक़्त किए जाता है सबकुछ
वक़्त जिए जाता है सबकुछ
मैं ने तेरा नाम लिया था
जब ख़ामोशी काट रही थी
मैं ने कोई ज़हर पिया था
जब तन्हाई कचोटती थी
अब जीने - मरने के भरम में
मैं पड़ना ही नहीं चाहता
मगर तेरी चाहत है फिर भी
अन्जानी क़ुर्बत है फिर भी
कहने को बाक़ी है अब कुछ
झूठ कह रहा हूं मैं सब कुछ
मेरी बात का यकीं न करना
मैं सच्चाई समझ रहा हूं
बहुत अकेली है सच्चाई