आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

झूठ कह रहा हूं मैं सब कुछ

                
                                                         
                            झूठ कह रहा हूं मैं सब कुछ
                                                                 
                            
वो भी हर सच को पहचान के
मुझे विसंगतियों से प्रेम हो
हां, कुछ तुझको अपना मान के
चोट लगी तो हंसी आ गई
काफ़ी अच्छा दर्द लगा
रात - रात भर नींद न आई
तेरा ख़्वाब भी साथ जगा
तू तो मेरी दुनिया है ना
मैं बस तेरा ही ख़्याल हूं
तू जवाब है आसमान का
और मैं धरती का सवाल हूं
बदल - बदल कर मौसम ख़ुद को
शायद चाहते हैं कुछ कहना
मैं तेरी यादों में रहूंगा
तू मेरे ख़्वाबों में रहना
वक़्त किए जाता है सबकुछ
वक़्त जिए जाता है सबकुछ
मैं ने तेरा नाम लिया था
जब ख़ामोशी काट रही थी
मैं ने कोई ज़हर पिया था
जब तन्हाई कचोटती थी
अब जीने - मरने के भरम में
मैं पड़ना ही नहीं चाहता
मगर तेरी चाहत है फिर भी
अन्जानी क़ुर्बत है फिर भी
कहने को बाक़ी है अब कुछ
झूठ कह रहा हूं मैं सब कुछ
मेरी बात का यकीं न करना
मैं सच्चाई समझ रहा हूं
बहुत अकेली है सच्चाई
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर