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कसूर मेरा ही निकला

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अपना समझ के जिसको मैं दिल में बसा गया,
        
                                                    
                            
वो जाते-जाते मुझको ही मुजरिम बना गया।

मैंने तो उसके ऐब ज़माने से ढक लिए,
वो मेरी एक भूल का किस्सा सुना गया।

जिसके लिए मैं धूप में दीवार बन गया,
वो मेरे हिस्से की भी छाया उठा गया।

मैं चुप रहा कि रिश्ते की इज़्ज़त बनी रहे,
वो मेरी ख़ामुशी को ही इल्ज़ाम बना गया।

हर बार उसकी भूल को अपना कहा मगर,
वो मेरी नेकियों को भी एहसान बता गया।

मैंने जिसे गिरने से बचाया था हर दफ़ा,
वो वक़्त आने पर मुझे ठोकर लगा गया।

जिसके लिए चराग़ जलाए तमाम रात,
वो सुबह होते ही मेरा घर जला गया।

मैं सच लिए खड़ा रहा तन्हा तमाम उम्र,
वो झूठ बोलकर भी ज़माना मना गया।

पूछा गया कि ज़ख़्म अभी तक हरा क्यों है,
जिसने दिया था ज़ख़्म, वही मुस्कुरा गया।

जिसको सुनाई दर्द की हर दास्ताँ कभी,
वो दर्द ही मेरा मेरी पहचान बना गया।

अब किससे अपने दर्द की फ़रियाद हम करें,
क़ातिल ही मेरे शहर में मुंसिफ़ बना गया।

मैं हारकर भी अपना ज़मीर बचा सका,
वो जीतकर भी ख़ुद को कहीं पर गँवा गया।

अब उससे कोई शिकवा, शिकायत नहीं रही,
जो कुछ हुआ, वो जीने का मतलब सिखा गया।

पत्थर समझ के राह में छोड़ा था जिसने मुझे,
वक़्त आया तो वही पत्थर निशाँ बना गया।

मैं आज भी खड़ा हूँ उसी शान के साथ,
जो तोड़ने चला था मुझे, ख़ुद बिखर गया।
— संतोष कुमार शर्मा
एक महीने पहले
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