मेरी बनाई योजना पर
फिर अपना संशोधन चला दिया।
मैंने सीधा-सा रास्ता माँगा था।
तुमने मोड़ दिए, पत्थर दिए
और मुसकराकर कहा—
“चलो, देखते हैं कितना विश्वास है।”
मैंने थोड़ा सुख माँगा।
तुमने अनुभव दे दिए—
इतने कि अब सुख सामने आए
तो भी पूछता हूँ—
“तुम सच हो या अगली परीक्षा?”
मैंने धन माँगा।
तुमने दिया भी—
पर हिसाब बड़ा विचित्र रखा।
जेब भर दी, मन खाली कर दिया।
घर बड़ा दिया, बातें छोटी कर दीं।
बिस्तर मुलायम दिया,
नींद वापस ले ली।
भोजन की मेज़ सजाई,
भूख कहीं रखकर भूल गए।
लोग बहुत दिए,
अपना कोई कम दिया।
पहचान दूर तक दी,
पर पास बैठकर हाल पूछने वाला
धीरे-धीरे छीन लिया।
तुम्हारा गणित
आज तक समझ नहीं पाया—
नाम बढ़ा तो चैन घटा,
भीड़ बढ़ी तो अकेलापन बढ़ा।
मैंने बच्चों के लिए आकाश माँगा।
तुमने उन्हें पंख दे दिए—
और मेरे हिस्से में
खाली आँगन लिख दिया।
अब उनकी आवाज़ दूर देश से आती है।
मैं मुसकराकर कहता हूँ—
“यहाँ सब ठीक है।”
तुम जानते हो—
‘ठीक’ शब्द
कितना बड़ा झूठ छिपा लेता है।
मैंने सफलता माँगी थी।
तुमने मंज़िल दी—
पर वहाँ पहुँचते-पहुँचते
वे लोग छूट गए
जिनके साथ पहला कदम रखा था।
सम्मान दिया, पद दिया,
फिर एक दिन कुर्सी खींचकर बोले—
“अब बताओ,
तुम स्वयं कितने बचे हो?”
बहुत चतुर हो तुम।
देते समय शर्तें नहीं बताते।
मन जुड़ जाए, तभी कहते हो—
“यह कुछ समय के लिए दिया था।”
कभी रिश्ता, कभी पद,
कभी स्वास्थ्य, कभी कोई अपना—
तुम्हारी वापसी की सूची
बहुत लंबी है।
मैंने कई बार तुम्हें संदेश भेजा—
घंटी बजाई, दीप जलाया,
हाथ जोड़े, नाम पुकारा।
तुमने उत्तर में मौन भेज दिया।
क्या मेरी प्रार्थना
तुम्हारी किसी फ़ाइल के नीचे
दब गई है?
या स्वर्ग में भी यही नियम है—
“आपका निवेदन
अभी विचाराधीन है।”
कभी लगता है
तुम भी बड़े अधिकारियों जैसे हो—
मिलने का समय नहीं देते,
पर हर दीवार पर
अपनी तस्वीर लगाए रखते हो।
मंदिर में तुम्हारा दरबार सजा है।
कोई नौकरी माँग रहा है,
कोई स्वास्थ्य, कोई न्याय।
तुम भीतर मुसकराते रहते हो
और पुजारी कहता है—
“धैर्य रखिए,
सबकी बारी आएगी।”
मैं नाराज़ हूँ तुमसे।
बहुत नाराज़—
क्योंकि मैंने तुम पर
बहुत भरोसा किया था।
जब दुनिया ने दरवाज़े बंद किए,
मैंने तुम्हारा दरवाज़ा खुला माना।
जब सबने पूछा—
“तुम्हारे पास क्या बचा?”
मैंने कहा—
“मेरा ईश्वर
अभी बाकी है।”
और तुमने मुझे प्रतीक्षा दे दी—
इतनी लंबी कि कई बार
उम्मीद भी थककर
मेरे पास बैठ गई।
फिर भी जब दर्द हद से बढ़ता है,
नाम तुम्हारा ही निकलता है।
जब भय रात में जगाता है,
हाथ तुम्हारी ओर जुड़ जाते हैं।
तुमसे शिकायत भी है,
तुम्हीं से आशा भी।
तुम पर क्रोध भी है,
तुम्हीं से नाता भी।
तुम्हें छोड़कर जाऊँ भी तो कहाँ?
दुनिया सुख में अपना कहती है—
तुमने कम-से-कम दुःख में
मुझे अपना रहने दिया।
शायद तुमने मेरी इच्छा पूरी नहीं की,
पर हर टूटन के बाद
उठने की शक्ति दी।
रास्ता आसान नहीं किया,
पाँव मज़बूत कर दिए।
आँसू नहीं रोके,
पर आँखों में उजाला बचाए रखा।
अब समझता हूँ—
जिसे तुम्हारी बेरुख़ी कहता रहा,
शायद वह मेरे भीतर कुछ गढ़ने की
तुम्हारी ज़िद थी।
फिर भी एक शिकायत रहेगी—
अगली बार कुछ देना,
तो उसके साथ
थोड़ा चैन भी देना।
धन देना तो नींद मत लेना।
मंज़िल देना तो अपने पीछे मत छोड़ना।
बच्चों को पंख देना
तो लौटने की एक शाम भी लिखना।
और यदि फिर कोई परीक्षा रखनी हो,
पहले बता देना।
मैं तैयारी नहीं करूँगा—
बस तुम्हारा नाम लेकर उतर जाऊँगा।
क्योंकि मैं जानता हूँ—
तुम मुझे गिरते देख मुसकरा सकते हो,
पर टूटते देख
चुप नहीं रह सकते।
खुश तो बहुत होगे तुम आज—
मैं फिर तुमसे लड़ते-लड़ते
तुम्हारे पास आ गया।
यही तुम्हारी जीत है
और मेरी भी—
इतनी शिकायतों के बाद
आज भी मेरे सबसे अपने तुम ही हो।
कल फिर तुम्हारे आगे दीप जलाऊँगा।
मन की सारी नाराज़गी
वहीं रख आऊँगा—
क्योंकि शिकायत भी उसी से होती है,
जिसके होने पर
सबसे अधिक विश्वास हो॥
— संतोष कुमार शर्मा