अपना अंदाज़ पेश करता हूं
लीजिए साहेबान मरता हूं
ज़िन्दगी ज़िन्दगी बनाने में
स्याह राहों से भी गुज़रता हूं
मैं ने कहना नहीं चाहा लेकिन
अपनी ख़ामोशियों से डरता हूं
मैं मोहब्बत को हार जब आया
क्या किसी बात से मुकरता हूं
रूह को जो सही लगे मेरी
फिर ख़ुदाई की सांस भरता हूं
मैं जिन्हें भूल भी नहीं सकता
मैं उन्हें याद बहुत करता हूं
हम धुएं में कहीं खो जाएंगे
आईना देख के हंस पड़ता हूं
ले के आई है ये कहां क़िस्मत
रोज़ जीता हूं रोज़ मरता हूं
क्या बताऊं मैं आज 'रंग' तुम्हें
मय सा सफ़्हों पे मैं उतरता हूं
- मृदुल