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फिर भी दिल कुछ कह पाया है

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दुनिया ने बहुत सताया है
        
                                                    
                            
फिर भी दिल कुछ कह पाया है
वैसे ये भी क्या कुछ कम है
जो साथ में हर पल साया है
मैं अपना आप तमाशाई
ख़ुद को जैसे लुटवाया है
तुम मुझे जानते होते तो
कहते जो सालता आया है
जाने क्यों मेरी बातों में
मेरा लहजा घबराया है
मैं सच - सच कहना चाहता हूं
पर झूठ तख़्त पर छाया है
अपने कमरे में रहता हूं
लिखने से जी बहलाया है
इन्सान बने रहने में भी
इन्सान ने शुक्र मनाया है
कुछ 'रंग' न कहना अब अपनी
तन्हाई को भरमाया है
- मृदुल
एक महीने पहले
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