विज्ञापन

अब पहले के जैसे वो इंसान कहाँ

User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अब पहले के जैसे वो इंसान कहाँ
        
                                                    
                            
मर मिटते थे जिस पर वो ईमान कहाँ।

चिपके हैं अब बूढ़े भी मोबाइल पर,
हाथों में अब गीता या कुरआन कहाँ।

सुख-दुःख में कोई भी देता साथ नहीं,
अब अपनों में गैरों की पहचान कहाँ।

गुंडे-बदमाशों की इज्जत होती है,
विद्वानों को मिलता वो सम्मान कहाँ।

नकली चीज़ों से हैं सब बाज़ार भरे,
असली मिलता अब कोई सामान कहाँ।

रील बनाने का है लोगों पर अब भूत चढ़ा,
पढ़ने-लिखने में बच्चों का ध्यान कहाँ।

'पॉप' सुना करते हैं ग्वाले मधुवन में,
खोयी कन्हैया की बंशी ने अपनी तान कहाँ।

बुरा मानते हैं समझाने पर भी वो,
'बादल' इनको भले-बुरे का ज्ञान कहाँ।
एक दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anil Pandey

387 कविताएं

View Profile

SHASHANK SRIVASTAVA

7 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10067 कविताएं

View Profile

Dn Chaubey

7088 कविताएं

View Profile