ये चलती नहीं, ये डसती है,
यह कैसी बेदर्द बस्ती है?
भुला दिए कितने गुनाह इस ट्रेन ने,
फिर भी यह बिना रुके चलती है...
जैसे कुछ हुआ ही नहीं, ये कैसी इसकी शान है?
ऐ अंधे कानून, बता... क्या यही 'मुंबई मेरी जान' है?
किस बड़े गुनाह का इंतजार है इसे,
जो अब तक आँखें खोलती नहीं?
कल फिर चली गई किसी की जान यहाँ,
पर यह बेकाबू रफ्तार कुछ बोलती नहीं।
ना आया कोई मंत्री, ना बोला कोई नेता,
यहाँ तमाशा देखने वाला हर शख्स है अभिनेता।
भुला दिया वो 'छब्बीस-ग्यारह' का मंज़र,
तो कल का हादसा भी भुला दिया जाएगा,
वो किसी के घर का चिराग था, किसी की शान था,
अब अखबार के एक कोने में दफन हो जाएगा।
मासूम बच्चों के सिर पर आ गया है अब भार,
लोकल में सफ़र करना, जैसे मौत से साक्षात्कार।
यहाँ हर छोटे-बड़े मुद्दे पर हड़ताल हो जाती है,
सड़कें जाम, सियासत की चाल हो जाती है।
पर उस घर की पड़ताल कभी नहीं हो पाती,
जहाँ की खुशियाँ बेवजह गमों में डूब जाती हैं।
वो रोती आँखें, वो सूना आँगन सवाल करता है,
यह शहर हर रोज़ एक नया ज़ख्म क्यों देता है?
पटरी पर बिखरे खून के कतरे, और तुम कहते हो 'लाइफलाइन' है,
जहाँ हर रोज़ मरता है आम इंसान, क्या वो वाकई ऑनलाइन है?
थक चुकी है यह मुंबई, अब तो इंसाफ का नाम दो,
इस खूनी रफ़्तार को अब ज़रा विराम दो ।।
-दीपिका