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जब खुद का किरदार देखता हूं दर्पण में

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ख़ुद को पढ़ता हूँ और छोड़ देता हूँ
        
                                                    
                            
हर रोज एक नया पन्ना मोड़ देता हूँ
रोज मिलते हैं जख्म इस दुनियां में,
आँखें मलता हूं और आगे बढ़ जाता हूं।
कैसे देखूं अपनों की बेरुखियां,
क्या करूं बात अधूरी छोड़ देता हूं।
जब खुद का किरदार देखता हूं दर्पण में,
तो घर का वह दर्पण तोड़ देता हूं।।
एक महीने पहले
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