भगवान दत्तात्रेय
जब तप की लौ धरा पर जागी,
तब देवलोक तक आभा छाई।
अत्रि ऋषि के निर्मल मन ने,
तब ईश्वर से लौ लगाई।
अनसूया की पावन निष्ठा,
वरदान स्वयं खींच लाई।
तीन रूप में एक ज्योति समाई,
दत्तात्रेय ने राह दिखाई।
ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने,
एक अलौकिक छवि सजाई।
अत्रि-अनसूया के आँगन में,
मंगल बेला चलकर आई।
दत्त बने जब जग के हित में,
गुरु की ज्योति फिर जगाई।
तीन रूप में एक ज्योति समाई,
दत्तात्रेय ने राह दिखाई।
एक मुख सृजन का मंत्र सुनाता,
दूजे ने फिर प्रीति जगाई।
तीसरा मोह से मुक्त कराता,
वैराग्य-ज्योति मन में छाई।
छह करों में दिव्य प्रतीक थे,
जीवन-दृष्टि उनमें समाई।
तीन रूप में एक ज्योति समाई,
दत्तात्रेय ने राह दिखाई।
सुरभि उनके साथ खड़ी थी,
वह धरती की ममता लाई।
चार श्वान चारों वेद बने,
वाणी उनमें सहज समाई।
प्रकृति के हर जीव-जगत ने,
गुरु की सीख हमें सुनाई।
तीन रूप में एक ज्योति समाई,
दत्तात्रेय ने राह दिखाई।
धरती, जल, आकाश और अग्नि,
उन्होंने सबमें शिक्षा पाई।
चंद्र, सूर्य, सागर और पवन ने,
उनको जीवन-राह सुझाई।
चौबीस गुरु प्रकृति से माने,
जग को विनय की रीति सिखाई।
तीन रूप में एक ज्योति समाई,
दत्तात्रेय ने राह दिखाई।
राजमुकुट से दूर रहे वे,
धूल भी चंदन बनकर आई।
माया के मेले से जब गुज़रे,
दृष्टि कहीं भी न भरमाई।
त्याग नहीं संसार से भागना,
ऐसी सहज समझ बन आई।
तीन रूप में एक ज्योति समाई,
दत्तात्रेय ने राह दिखाई।
भटके मन ने जब भी पुकारा,
मौन दिशा बनकर आई।
अहंकार की गाँठ खुली तो,
भीतर शांति सहज समाई।
गुरु भीतर भी साथ विराजे,
अंतर-ज्योति फिर जगाई।
तीन रूप में एक ज्योति समाई,
दत्तात्रेय ने राह दिखाई।
ज्ञान मिले तो विनम्र हो जाना,
यह सीख हृदय में आई।
धन हो, बल हो, पद हो चाहे,
दृष्टि कभी भी न इतराई।
हर अनुभव से सीख जो लेता,
उसने सच्ची मंज़िल पाई।
तीन रूप में एक ज्योति समाई,
दत्तात्रेय ने राह दिखाई।
त्रिमूर्ति का सार समेटे,
तब करुणा जग में छाई।
योग, विराग और सेवा ने,
मानवता की राह सजाई।
गुरु की ज्योति मन में जागी,
भीतर भोर उतर आई।
तीन रूप में एक ज्योति समाई,
दत्तात्रेय ने राह दिखाई।
— संतोष कुमार शर्मा