अकेले चले थे मेरे पापा!
तन्हा थे, मगर तन्हाई से कभी हार नहीं मानी,
बचपन से ही मेहनत को अपनी ताकत बनाई।
ना सिर पर माँ का आँचल था, ना हाथ में पिता का हाथ,
फिर भी मुस्कुराकर तय किया हर कठिन रास्ता।
जब उम्र थी खेलने की,
तब जिम्मेदारियों से दी।
जब बच्चों के हाथों में किताब थी,
तब उनके हाथों में मेहनत की लकीर थी।
हर दर्द चुपचाप सहते गए,
हर आँसू को अपने भीतर ही रखते गए।
गिरकर भी हर बार खड़े हुए,
अपने पसीने से अपना घर बनाया।
फिर अपने बच्चों का भविष्य सजाया,
खुद की हर खुशी को कुर्बान कर
हमें पढ़ाया, हमें आगे बढ़ाया।
मेरे पापा ने मुझे सिखाया—
कि इंसान की पहचान उसके हालात नहीं,
उसकी मेहनत और हौसले बनाते हैं।
मुझे गर्व है कि मैं उस शख्स की बेटी हूँ,
जो बचपन से अकेले लड़ा,
लेकिन कभी हारे नहीं।