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रूठकर बैठा था वो, न दूर था, न पास था,

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अधूरी बात
        
                                                    
                            
रूठकर बैठा था वो, न दूर था, न पास था,
दिल में शिकायत थी, मगर लबों पर ख़ामोशी का पहरा था।
वो बैठा रहा अपनी उदासी में,
मैं उलझा रहा अपनी ही परेशानी में।
डर था कि कहीं वो दूर न हो जाए,
इसी डर में कहीं बात ही न खो जाए।
वक़्त गुज़रता गया, मगर बात न हो पाई,
दिल में बहुत कुछ था, मगर ज़ुबाँ तक न आ पाई।
उसकी आँखें कहना तो बहुत कुछ चाहती थीं,
मगर न जाने क्यों, वो कह नहीं पाईं।
आज भी याद आता है वो ख़ामोश-सा पल,
जब पास होकर भी दूर थे हम उस पल।
क्या बात थी, जो वो रूठा ही रह गया,
मेरे दिल में बस यही सवाल रह गया…
3 घंटे पहले
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samarth dalela

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