साँझ ढली तो पथ भी सूना था,
मन का कोना-कोना सूना था,
फिर भी भीतर दीप जला था,
रात के आगे कौन झुका था।
पत्ता टूटा, डाली छूटी,
मौसम बदला, ऋतु भी रूठी,
आँधी आई, धूल भी उड़ी,
जड़ में फिर भी साँस न टूटी।
वक़्त ने छीना, वक़्त ने तोड़ा,
अपने ही साए ने मुँह मोड़ा,
मैंने फिर भी राह न छोड़ी,
काँटों से अपना नाता जोड़ा।
राख तले अंगार बचा था,
शून्य तले संसार बचा था,
जिसको अंत समझ बैठे थे,
उसमें ही आरम्भ छिपा था।
अब जो उगना है, उग जाऊँ,
सूखी धरती को हरियाऊँ,
कल जिसने मुझको मिट्टी समझा
उसके आगे वृक्ष बन जाऊँ।।।