आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अब जो उगना है, उग जाऊँ

                
                                                         
                            साँझ ढली तो पथ भी सूना था,
                                                                 
                            
मन का कोना-कोना सूना था,
फिर भी भीतर दीप जला था,
रात के आगे कौन झुका था।

पत्ता टूटा, डाली छूटी,
मौसम बदला, ऋतु भी रूठी,
आँधी आई, धूल भी उड़ी,
जड़ में फिर भी साँस न टूटी।

वक़्त ने छीना, वक़्त ने तोड़ा,
अपने ही साए ने मुँह मोड़ा,
मैंने फिर भी राह न छोड़ी,
काँटों से अपना नाता जोड़ा।

राख तले अंगार बचा था,
शून्य तले संसार बचा था,
जिसको अंत समझ बैठे थे,
उसमें ही आरम्भ छिपा था।

अब जो उगना है, उग जाऊँ,
सूखी धरती को हरियाऊँ,
कल जिसने मुझको मिट्टी समझा
उसके आगे वृक्ष बन जाऊँ।।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर