हां जी, क्या कहा.... लड़की हूं मैं कमज़ोर,
ज़रूरत है मुझे बचाने की...
अच्छा तो सुनो...!!
ज़रूरत नहीं मुझे बताने की,
ज़रूरत नहीं मुझे सीखाने की,
ज़रूरत नहीं ये समझाने की,
कि कमज़ोर हूँ मैं....
बताती चलूं...
मालूम है मुझे लड़की हूं मैं,
सीता हूं, राधा हूं, मीरा भी हूं मैं,
फात्मा हूं, ज़हरा हूं, हलीमा भी हूं मैं,
लक्ष्मी हूं, रज़िया हूं, सावित्री भी हूं मैं,
मुझे नही लगता है ज़रूरत तुम्हें बताने की,
लड़की हूं मैं...
जग बना जब से,
कभी हव्वा, कभी हलीमा,
कभी मरियम बनकर चली हूं मैं,
वक़्त पड़ा तो लक्ष्मी बनकर सामने से लड़ी हूं मैं,
मीरा भी बनी, राधा भी बनी और फिर
सीता बनकर जली हूं मैं,
सावित्री भी मैं हूं, सुनीता भी मैं हूं,
सुषमा भी मैं, इंदिरा भी मैं,
प्रतिभा बनकर राष्ट्र की नियति बनी हूं मैं,
गीता हूं मैं, सानिया हूं मैं,
मैरी बन राष्ट्र हित के स्वर्णिम पथ पर चली हूं मैं.....
मुझे न बताओ कौन हूं मैं.....
बस तुम ये जान जाओ..
लड़की हूं और शुरू से लड़ी हूं मैं...!!
-उरूज फात्मा
ग़ाज़ीपुर, उत्तर प्रदेश
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