गुरु की महिमा लिख पाना, शब्दों में आसान नहीं,
जिसने जीवन गढ़ा हमारा, वो साधारण इंसान नहीं।
अंधेरों में जब भटके थे, तुमने दीप जलाया था,
अज्ञान की गहरी नींद से, तुमने ही तो जगाया था।
तुमने ही तो सिखलाया था, सच की राह पर चलना,
गिर कर कैसे उठना है, और बिना रुके संभलना।
कभी डांटा, कभी समझाया, कभी प्यार से सहलाया,
अपने सुख-दुख भूल कर, बस हमको ही पढ़ाया।
ब्लैकबोर्ड की उस कालिख में, भविष्य रंगीन दिखाया,
एक अनगढ़ पत्थर को तुमने, तराश कर हीरा बनाया।
तुम हो गंगा की धारा, जो निर्मल ज्ञान बहाती है,
तुम हो वो पहली सीढ़ी, जो आकाश तक ले जाती है।
जीवन भर ऋणी रहेंगे, इस कर्ज़ को चुका न पाएंगे,
तुम्हारे चरणों की धूल को, हम माथे से लगाएंगे।
हे गुरुवर, हे पथ-प्रदर्शक, तुम्हें शत-शत नमन है,
तुमसे ही रोशन है जीवन, तुम्हें ही मेरा वंदन है।