एक सूक्ष्मजीव ने ये कैसा हाहाकार मचाया
हे महामानव तुझे अर्श से फर्श पर पहुंचाया॥
तू जीतने चला परमाणु हथियार से बह्रमाण्ड को
पर देख जीत न सका तू एक विषाणु की मार को॥
एक सुक्ष्मजीव ने तुझे कैसे अशांत कर दिया
तेरे अंदर बैठी वषोॅ की होड़ को कैसे शांत कर दिया॥
तू तो चला था प्रकृति को जीतने आधुनिक हथियारों से
पर देख जीत न सका तू इस कोरोना की मार से॥
एक सूक्ष्मजीव ने ये कैसा विनाश है ढाया
हे महामानव तूझे आज असहाय, निरबल है पाया॥
तू सीख ले अभी भी सयंमित जीवन जीना
ताकि न पड़े तुझे भविष्य में विषाणु का विष पीना॥
एक सूक्ष्मजीव ने ये कैसा हाहाकार मचाया
हे महामानव तुझे अर्श से फर्श पर पहुचाया॥
-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।