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विकास की बात

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            धूप को सम्हालने बादल चले।
        
                                                    
                            
बदनाम अंधेरों ने ये चाल चले।
चेतना के रूप में दुश्मनी बढी।
विश्वास घटा तो अदालत चले।
गाँव का ईंधन उपला लकडी।
पुराने जमाने से आजतक जले।
राशन लेने वालो के आंकड़े चढ़े।
तो यों लगा गरीबी में बढत मिले।
कई रूप में विकास चल रहा।
मगर आय के कम स्रोत मिले।
शिक्षा स्वस्थ हांफता दिख रहा।
लोग कहते 'उपदेश' बहुत मिले।

उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
गाजियाबाद
 
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