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शर्म नहीं आती

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ये दौलत की जरूरत, मर नहीं पाती।
        
                                                    
                            
उधार लेने वालो को, शर्म नहीं आती।
देने वालों को, मांगने वाला बना दिया।
फिर भी, जरूरतें कालिख नहीं जाती।
लेने के शौकीन, लेके कब अदा करते।
वापसी बिना वसूली, पूरी नहीं आती।
अपनो में लेन-देन, वही पे तल्खी रहे।
है तो दे 'उपदेश', इसमें बू नहीं आती।

उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
गाजियाबाद
 
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4 वर्ष पहले
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