विज्ञापन

जहाँ शाम ढ़लने से पहले सन्नाटा फैलता है।

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब कभी तुम सिहरन से कांपती होंगी।
        
                                                    
                            
उस पल तेरी साँसे मदमस्त नाचती होंगी।।

तेरी आँखों के उस कोने में इंतजार होगा।
हल्की-फुल्की आहट को भी भांपती होंगी।।

मैं आऊंगा फिर देखूँगा छू कर कमर तेरी।
अनलिखे पन्नों की तरह फडफडाती होंगी।।

कहानी की आखिरी लाइन अभी बाकी है।
बारिश छुने से जैसे पत्ती थरथराती होंगी।।

जहाँ शाम ढ़लने से पहले सन्नाटा फैलता है।
याद बिना इजाज़त 'उपदेश' सिसकती होंगी।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all