अन्दर की छटपटाहट रिहाई मांग रही।
जान अब नही सोती और न जाग रही।।
उलझी साँसे हृदय पटल के स्पन्दन में।
बहती हुई नदी जैसे किनारा मांग रही।।
आत्मा का वियोग शरीर की जंजीरों से।
हर हाल में विदा लेने को रिहाई मांग रही।।
अब मुक्ति का स्वप्न आँखों में जाग उठा।
मौत के आगोश में भी सब सुख भोग रही।।
इतनी शांत पहले कभी न रही 'उपदेश'।
जिन्दगी की किताब पलटने से भाग रही।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'