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मंज़िल के करीब दुआ

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मौन रहना कितना अच्छा और कब तक होता।
        
                                                    
                            
जानो तो दिल में रहने वाला शायद तंग होता।।

कभी-कभी लिखो उसके बारे में तुम खुलकर।
जिसके साये से खुश होती खुदा का योग होता।।

साथ चलने वालो के बीच में अनबन हो ही जाती।
तब याद आता दिलबर ना मिले तो वियोग होता।।

पहले पता नही था मंजिल के करीब दुआ होती।
मोहब्बत की दूरी में तड़पता रंगीन योग होता।।

अलग तरह का सुकून 'उपदेश' तन्हा होकर मिला।
कलम चलने लगी हर लाइनों में उसका योग होता।।

- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
एक घंटा पहले
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