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मैं साथ तेरे दिल की तह में 'उपदेश

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ठोकर खाकर चल पड़ी कश्ती रुकी थी।
        
                                                    
                            
दुविधा दिल की उड़ गई मैं न थकी थी।।

तकलीफों का फैलाव अँधेरों के पीछे।
उजालों की बेकरारी अभी न थकी थी।।

सूरज की उगती किरणो से गर्मी लेकर।
परिन्दों की उड़ान कभी न थकी थी।।

दिखावे के रिश्ते में मोहब्बत छिपाई।
हकीकत की आँधी अभी न थकी थी।।

ये तन्हा सफर और यादो का लश्कर।
मिलने मिलाने में कभी न थकी थी।।

मैं साथ तेरे दिल की तह में 'उपदेश'।
कहते जिन्दगी धड़कती न थकी थी।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
एक महीने पहले
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