दो धड़कनें जब थोड़ा करीब आती।
आँखें खुद-ब-खुद बन्द सी हो जाती।।
साँसों की गर्मी कुछ कहना चाहे तब।
बिना इजाजत खुद समर्पित हो जाती।।
छोटे से स्पर्श से ज़ज्बात चहक उठते।
उंगलियाँ तुम्हारी उँगलियों से छू जाती।।
अब साँसों की हवा जानी पहचानी सी।
बिना शोर के नथुनों से प्रवेश कर जाती।।
तब सिर चेहरे को गर्दन के करीब लाता।
और 'उपदेश' तन में बिजली दौड़ जाती।।
फिर मुस्कुराती थोड़ा थोड़ा कसमसाती।
पैदा होते संगीत से मंत्रमुग्ध हो जाती।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'