दिल की बात यों करूँ हारे हुए दिल से।
तन्हा खुश न रह पाऊँगी सनम दिल से।।
किसको जीतना चाहूँ मैं बेबस हार कर।
खुद से समझौता कर रही अब दिल से।।
कर्मो से मिले प्यार गर छप्पर फाड़कर।
तो पाप भी मंजूर करके देखेंगी दिल से।।
कभी उसकी पोस्ट पर झाँकती रह गई।
समझ पाई सार तब हँसती रही दिल से।।
मुहँ फुलाना माहौल सा बन चुका घर में।
छल कपट पाप 'उपदेश' चल रहे दिल से।।
इंसान टूटकर ही नया बनता अपने आप।
जीना ही तो है बेबसी में जी रही दिल से।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'