आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बाजी पलट गई

                
                                                         
                            दिल की बात यों करूँ हारे हुए दिल से।
                                                                 
                            
तन्हा खुश न रह पाऊँगी सनम दिल से।।

किसको जीतना चाहूँ मैं बेबस हार कर।
खुद से समझौता कर रही अब दिल से।।

कर्मो से मिले प्यार गर छप्पर फाड़कर।
तो पाप भी मंजूर करके देखेंगी दिल से।।

कभी उसकी पोस्ट पर झाँकती रह गई।
समझ पाई सार तब हँसती रही दिल से।।

मुहँ फुलाना माहौल सा बन चुका घर में।
छल कपट पाप 'उपदेश' चल रहे दिल से।।

इंसान टूटकर ही नया बनता अपने आप।
जीना ही तो है बेबसी में जी रही दिल से।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर