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होली के रंग फीके...

umesh shukla

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            
होली के रंग फीके दिखे
अब महंगाई की मार से

जन जन के चेहरे बेरौनक
नित बढ़ते आर्थिक भार से

रंग. गुलाल. अबीर आदि 
सामानों से पटे हैं सब बाजार

दुकानदारों का रोना अबकी
कम दिख रहे हैं खरीददार

कोरोना के बाद से छाई रही
मंदी की जो काली चादर

अब भी हटने का नाम नहीं
ले रही. लहरा रही निरंतर

ऐसे में कैसे रौनक छाए
आए उत्सव की बहार

सोच की मुद्रा में दिखते हैं
सब संगी. साथी. रिश्तेदार

अधिकांश चेहरों पे दिखता
है हरदम तनाव का घेरा

रोना उनका यही के जीवन 
को बढ़ती महंगाई ने बिखेरा
2 वर्ष पहले
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