जब भी मैं उस नीले ड्रम की ओर देखता हूँ,
वह मुझे कोई साधारण ड्रम नहीं,
एक समाधि-सा प्रतीत होता है।
एक ऐसी समाधि,
जिसमें दफ्न है केवल एक इंसान नहीं,
बल्कि एक आदर्श समाज की कल्पना,
हमारे संस्कारों की शेष बची हुई गरिमा,
और मानवीय संवेदनाओं की अंतिम पुकार।
यह समाधि है उस विश्वास की,
जो रिश्तों की नींव हुआ करता था,
उस प्रेम की, जिसमें समर्पण था,
उस विवाह की, जिसमें जीवनभर साथ निभाने का
एक पवित्र संकल्प हुआ करता था।
यह समाधि है उस स्त्रीत्व की,
जिसमें करुणा थी, ममता थी,
त्याग, सहनशीलता और सृजन की शक्ति थी।
उस स्त्री की महानता की कल्पना की,
जिसे समाज ने कभी अपने आदर्शों में स्थान दिया था।
पर ठहरो!
क्या स्त्रीत्व की गरिमा किसी एक स्त्री के अपराध से मिट जाती है?
क्या एक व्यक्ति का पतन समस्त नारीत्व का परिचय है?
नहीं!
यह प्रश्न किसी एक स्त्री का नहीं,
उस मानवीय चेतना का है,
जो स्त्री हो या पुरुष,
जब अपने विवेक से विमुख होती है,
तो संबंधों को संवेदनाओं से नहीं,
स्वार्थ की कसौटी पर तौलने लगती है।
यह परिवर्तन किसी एक दिन नहीं आया,
न ही किसी एक घटना ने इसे जन्म दिया।
यह तो धीरे-धीरे हुआ है—
हमारे बदलते आदर्शों के बीच,
हमारी भागती हुई जिंदगी के बीच,
हमारे अपने ही हाथों निर्मित
उस आधुनिक संसार के बीच।
विज्ञान ने हमें गति दी,
संचार ने संसार को पास ला दिया,
इलेक्ट्रॉनिक युग ने दूरियों को मिटाया,
पर न जाने क्यों,
इंसान के भीतर की दूरियाँ बढ़ती चली गईं।
हमने उँगलियों के स्पर्श से
दूर बैठे लोगों को अपना बना लिया,
पर पास बैठे अपनों की पीड़ा
महसूस करना छोड़ दिया।
सूचनाओं का संसार विशाल होता गया,
पर संवेदनाओं का संसार सिमटता गया।
हमारे पास संवाद के अनगिनत साधन हैं,
लेकिन मन की बात सुनने वाला हृदय
कहीं पीछे छूटता गया।
हमने बुद्धि को विकसित किया,
पर विवेक को कितना सँवारा?
हमने सुविधाओं के महल खड़े किए,
पर अपने भीतर के मनुष्य को
कितना सुरक्षित रखा?
आज प्रश्न केवल इतना नहीं
कि अपराध किसने किया,
प्रश्न यह भी है
कि हमारी सामाजिक चेतना ने
किस दिशा में चलना स्वीकार किया।
किसी एक व्यक्ति को कटघरे में खड़ा करके
क्या हम स्वयं को निर्दोष घोषित कर सकते हैं?
न्यायालय अपराध का निर्णय कर सकता है,
दोषी को दंड दे सकता है,
पर समाज के भीतर मरती संवेदनाओं का
निर्णय कौन करेगा?
कानून अपना कर्तव्य निभाएगा,
न्याय अपना मार्ग तय करेगा,
पर क्या केवल दंड से
हम अपनी मरती अन्तर आत्मा को बचा पाएँगे?
उस नीले ड्रम में बंद
एक जीवन की त्रासदी हमें पुकारती है—
अपने भीतर झाँको,
अपने संस्कारों को परखो,
अपने बच्चों को केवल सफल होना नहीं,
मनुष्य बने रहना भी सिखाओ।
क्योंकि किसी समाज का पतन
केवल तब नहीं होता,
जब कोई जघन्य अपराध घटित होता है;
उसका पतन तब भी होता है,
जब अपराध की खबर सुनकर
हम कुछ क्षण विचलित होते हैं
और फिर सब कुछ भूल जाते हैं।
आज उस नीले ड्रम को देखकर
मेरे मन में एक प्रश्न उठता है—
क्या यह केवल एक मृत देह की समाधि है,
या उस समाज की भी,
जो अपने आदर्शों को खोकर
अपनी ही उपलब्धियों पर गर्व कर रहा है?
यदि यह समाधि हमें झकझोर सके,
यदि यह हमारी सोई हुई चेतना को जगा सके,
यदि इसके सन्नाटे में
हम अपने भीतर के मनुष्य की आवाज सुन सकें,
तो शायद इसकी भयावहता के बीच भी
एक नई शुरुआत का मार्ग दिखाई दे।
आइए, किसी एक चेहरे को दोष देकर
अपने दायित्व से मुँह न मोड़ें।
नारी का सम्मान करें,
पुरुष के विवेक को जगाएँ,
रिश्तों में विश्वास को जीवित रखें,
और विज्ञान की प्रगति के साथ-साथ
मानवता का विकास भी सुनिश्चित करें।
क्योंकि हमें केवल
एक विकसित समाज नहीं बनाना है,
हमें एक संवेदनशील समाज भी बनाना है।
और जिस दिन
मनुष्य की आँखों में दूसरे के दुःख के लिए
फिर से आँसू होंगे,
उस दिन शायद
उस नीले ड्रम की समाधि पर
मानवता का एक नया दीप जलेगा।
वह दीप हमें याद दिलाएगा—
सभ्यता की पहचान हमारी तकनीक नहीं,
हमारे भीतर जीवित मनुष्यता है।
- उमेश मिश्रा