आगरा पूरे जगत के नक्शे में छाया
जहां हर तरफ फैला है ताज का जादुई साया
एक अवसर ,यादों का सैलाब लाया
अरसे पहले मेरा ताजगंज में रूकना
घर की छत से ताजमहल का दीदार करना
पूर्णिमा की चांदनी रात ,उस पर ताजमहल की सफेदी
छत पर बहती शीतल हवा और सूखती यमुना नदी
एक शाम चल पड़े कदम ताजमहल की ओर यूंही बस
पैदल टहलते पहुंच गये,तब कोई टिकट नहीं था, जब चाहे चल पड़ो जसतस
देखा नजारा दो संगमरमरी कब्र करीब करीब जमीं हुई
रश्क आया उनके आपसी बेपनाह मुहब्बत पर और मै आहत हुई
कोई इतना प्यार आपस में कैसे कर लेता है
एक नायाब तौफा जेहन में कैसे गढ़ लेता है
लोभान की खुशबु नथुने में फैलने लगी
आस पास बिखरे सूखे फूलों की महक छाने लगी
लेकिन लटकते कुछ जाले और चमगादड़ आहें भरते नजर आये
कैमरा लटकाये युवक ठिठौली पर उतर आये
गुम्बदों पर टिके मधुमक्खी के छत्ते और गुनगुन डराने लगे
और मेरे मजबूर कदम अब वापस लौटने को कहने लगे