कृष्ण वही जो सबको आकर्षित कर सके,
वह है वही जो सबके मन को लुभा सके,
माखन चुराते चुराते ,कब चैन चुरा जाए,
इसका पता न चल सके,
की कब गाय चराते चराते,लोगों को चराने लग जाए,
इसका कुछ खबर न लग सके ,
कालिया नाग पर नृत्य करते करते कब मन में समा जाए,
कब स्वयं नाचकर ,आपको भी नचा जाए ,
इसकी न कोई पोल पा सके,
रास रचाते रचाते कब युद्ध रचा दे ,
कब एक रस्सी में बंध , छुड़ाने को मचले,
कब मुख में संपूर्ण ब्रह्मांड दिखा दे,
कभी विदुर के यहां सुखी सादी साग खाकर खुश हो जाए,
तो कभी 56 प्रकार के भोग ग्रहण कर भीअतृप्त रह जाए,
कभी मां यशोदा के डंडे की मार को चुपचाप सह जाए,
तो कभी ऐसा विकराल रूप दिखाए कि सब झुकने को मजबूर हो जाए,
सब जानते उसे ,पर भ्रम पैदा करे कि जैसे वो कुछ है ही नहीं,
और जब दुर्योधन बांधने चला तो दिखाया उससे बड़ा कोई है ही नहीं,
कभी सब कुछ सह कर,राधा के प्रेम में सब कुछ हार जाए,
कभी बिना शस्त्र उठाए,संपूर्ण महाभारत जीता जाए,
उसको नहीं हम समझ सकते,जो खुद को नहीं समझ सका,
कैसी कैसी लीलाएं रची ,खुद भी नहीं वह जान सका,
नियति ने क्या क्या लिखा,जैसे वो पहले ही जान गया हो,
कब कैसे कैसे खेल खेलेगा ,जैसे सबकुछ पहले से ही तय किया हो।