परिवार का आरम्भ
ऋणों में महाऋण के प्रतीक
समय व लोक निश्चित
दिन सोलह
जिसकी जैसी श्रृद्धा
वैसा ही दान
दान कहूं या सर्मपण
सेवा महान,
जीवन से मुक्ति की तरह
महत्वपूर्ण है पितर ऋण से उऋण
वंदन अभिननदन नित
वह भी उचित समय पर
उचित व्यक्ति के द्वारा
तभी होता है सच का
मन मनस्वी का
तर्पण समर्पण
मार्ग खुलता
तृप्ति सन्तुष्टि का
पितर लोक से आने का
उद्देश्य पूर्ण
और वापसी का मार्ग
पितृविसृजन
आरम्भ पूर्णिमा से
समापन
अमावस्या को
स्थान गया प्रयाग मेघंकर
ब्रह्मकपाल, लोहागढ़,सिद्धनाथ
लक्ष्मण बाण,
दिशा दक्षिण
पात्र तांबे कांसे का
समय कुतुप
स्थान पितरों का सदा
दक्षिण अथवा
दक्षिण पश्चिम
श्रृद्धा विश्वास पूर्ण
तभी श्राद्ध,
सफलता सार्थकता
उद्देश्य की
तर्पण की
बात पितरों की।