विज्ञापन

आहुति दो हुंकार उठी

देवसुधा पत्रिका

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज हमारे देश की सीमाएं
        
                                                    
                            
फिर से हैं पुकार उठी
कहां सो रहे वीर युवाओ
आहुति दो हुंकार उठी।
वैरी का दल आ पहुंचा है
तू कहां सोया शैय्याओं पर
कब तक रहेगी पद्दलिता
मातृभूमि भैय्याओं पर।
स्वप्न अतीत के देखना छोड़ो
भविष्य की पीढ़ी याद करो
घर कर बैठी ओछी मानसिकता
तोड़ो न कोई फरियाद करो।
क्लीवता शोभा नहीं तुम्हारी
परा उपदेश भला क्यों देते हो
सज्जनता की भी मर्यादा
दुष्टता को अवसर क्यों देते हो।
दूध पिलाओ मत सर्पों को
न आस्तीन में उनको पालो
मां के बेटे जो दुष्ट हुए हैं
अब पौरुषता से उन्हें संभालो।
स्वंय शरीर भले न रहे
पर स्वदेश का मान जाने न पाए
रक्त की एक एक बूंद चढ़ा दो
दुष्टों का दल फिर न आ जाए।
जो पूर्वजों ने की थी गलतियां
अब हम उनको न दुहराएं
वह हमको कितना बहकाएं
क्यों उन पर विश्वास बनाएं।
अटल निश्चय कर लो सब
दुष्टों की दाल गलने न देंगे
सहनशीलता की एक सीमा
मच्छर सा पकड़ मसल जो देंगे।
विश्व कहे आतंकवाद अब
हम दशकों से सहते आए
वह झेल सके एक न हमला
हमने असंख्य झेल दिखाए।
ऐसे में बोलों कैसे हम
अविश्वसनीय पर विश्वास करें
जो आहट से पैंतरा बदलते
ऐसे दुष्टों पर कोई आस धरें।
3 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Shivam Awasthi

3 कविताएं

View Profile