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आहुति दो हुंकार उठी

                
                                                         
                            आज हमारे देश की सीमाएं
                                                                 
                            
फिर से हैं पुकार उठी
कहां सो रहे वीर युवाओ
आहुति दो हुंकार उठी।
वैरी का दल आ पहुंचा है
तू कहां सोया शैय्याओं पर
कब तक रहेगी पद्दलिता
मातृभूमि भैय्याओं पर।
स्वप्न अतीत के देखना छोड़ो
भविष्य की पीढ़ी याद करो
घर कर बैठी ओछी मानसिकता
तोड़ो न कोई फरियाद करो।
क्लीवता शोभा नहीं तुम्हारी
परा उपदेश भला क्यों देते हो
सज्जनता की भी मर्यादा
दुष्टता को अवसर क्यों देते हो।
दूध पिलाओ मत सर्पों को
न आस्तीन में उनको पालो
मां के बेटे जो दुष्ट हुए हैं
अब पौरुषता से उन्हें संभालो।
स्वंय शरीर भले न रहे
पर स्वदेश का मान जाने न पाए
रक्त की एक एक बूंद चढ़ा दो
दुष्टों का दल फिर न आ जाए।
जो पूर्वजों ने की थी गलतियां
अब हम उनको न दुहराएं
वह हमको कितना बहकाएं
क्यों उन पर विश्वास बनाएं।
अटल निश्चय कर लो सब
दुष्टों की दाल गलने न देंगे
सहनशीलता की एक सीमा
मच्छर सा पकड़ मसल जो देंगे।
विश्व कहे आतंकवाद अब
हम दशकों से सहते आए
वह झेल सके एक न हमला
हमने असंख्य झेल दिखाए।
ऐसे में बोलों कैसे हम
अविश्वसनीय पर विश्वास करें
जो आहट से पैंतरा बदलते
ऐसे दुष्टों पर कोई आस धरें।
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2 hours ago

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