विज्ञापन

वो नहीं तो यह शहर वीरान सा लगता है

देवर्षी मनीष येंडे

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वो नहीं तो यह शहर वीरान सा लगता है,
        
                                                    
                            
मायूस है कोई तो कोई हैरान सा लगता है

किसी उम्मीद पर आबाद थी ये बस्ती,
आस जो छुटी तो एक बयाबाँ सा लगता है

इतनी खामोशी क्यों है उस गली में आखिर,
वो भी इन दिनों बेज़ुबान सा लगता है

किस मकाम पर ले आई है ज़िंदगी मुझको,
हर कोई यहाँ अंजान सा लगता है

कभी चुराता था जो नींद कंधों से मेरे,
इन दिनों कुछ परेशान सा लगता है

तेरी चाहत का इल्ज़ाम लिए फिर रहा हूं,
ये सांप भी अब गले में गिरेबाँ सा लगता है

- देवर्षी मनीष येंडे
 
8 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dn Chaubey

7450 कविताएं

View Profile