वो नहीं तो यह शहर वीरान सा लगता है,
मायूस है कोई तो कोई हैरान सा लगता है
किसी उम्मीद पर आबाद थी ये बस्ती,
आस जो छुटी तो एक बयाबाँ सा लगता है
इतनी खामोशी क्यों है उस गली में आखिर,
वो भी इन दिनों बेज़ुबान सा लगता है
किस मकाम पर ले आई है ज़िंदगी मुझको,
हर कोई यहाँ अंजान सा लगता है
कभी चुराता था जो नींद कंधों से मेरे,
इन दिनों कुछ परेशान सा लगता है
तेरी चाहत का इल्ज़ाम लिए फिर रहा हूं,
ये सांप भी अब गले में गिरेबाँ सा लगता है
- देवर्षी मनीष येंडे
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