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ग़ज़ल : गो शहर-भर आवारगी

Tejpal Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            गो शहर-भर आवारगी बर्पा हुई,
        
                                                    
                            
संसद में लेकिन शून्य-भर चर्चा हुई।

लोग कहते हैं कि कल जिंदा थी पर,
है आजकल इंसानियत मुर्दा हुई ।

शायरी के मायने कुछ हों न हों,
शायरी पर हर समय फतवा हुई ।

बेईमानी का असर कुछ यूँ बढ़ा,
ईमानदारी खुद ही बा-पर्दा हुई ।

मौत बेशक मूल भी है ब्याज भी,
जिंदगी पर 'तेज' बस खर्चा हुई।

- तेजपाल सिंह 'तेज'
3 वर्ष पहले
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