छठ पूजा का हुआ है आगमन,
रिश्तों का हुआ है पदार्पण।
साफ़ हो रहे घर आंगन,
इतरा रहा है कोना कोना।
सज रहे हैं हाट बाज़ार,
कहीं बिक रहे हैं दौरा सूप,
कहीं है मिट्टी के चूल्हे,
कहीं है पूजा सामग्री।
और फलों की तो आई है बहार,
मानों, सूर्य अर्ध्य के लिए खड़े हैं तैयार ।
चार दिनों का है त्योहार,
सब दिनों की महत्ता अपरंपार।
खीर पूरी का दिव्य आस्वाद,
सुवाषित होता ‘ठेकुआ ‘ प्रसाद ,
व्रत है कठिन, पर नहीं है दुष्कर,
सब खड़े रहते तत्पर।
एक ऐसी अनुभूति,
जो करती सामाजिक एकता को सार्थक।
रंग बिरंगी रोशनी से सांवरी नदी की घाटें,
सब लोग खड़े ज़िम्मेदारियों को बांटे।
पलक पावड़े बिछाई हैं राहें,
उत्त्कंठा पूर्वक सबने फैलायी है बाहें,
‘व्रती’ के स्वागत में।
गूँज रही हैं दसों दिशाएँ,
छठी मईया के गीतों से।
भाव विभोर है सब भक्ति के रस में,
उमड़ पड़ा है जन सैलाब,
आकर्षक परिधानों में।
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