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“बाबरा-बे-ऐतबारी का मौसम”

sushilkumar babra

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                            जो दिल पे बीतती है, लोग फ़साने कहते हैं,
        
                                                    
                            
हम अपने ज़ख़्म को ख़ामोश तराने कहते हैं।

ये कैसी बस्ती है, हर शख़्स ख़ुद में क़ैद हुआ,
यहाँ रिश्तों को भी लोग अब बेगाने कहते हैं।

जिन्हें ख़ुद अपने ज़मीरों का पता मालूम नहीं,
वही दुनिया को हमेशा नेक़ बहाने कहते हैं।

ग़रीब भूख से मरता रहे तो मरता रहे,
अमीर लोग इसे वक़्त के निशाने कहते हैं।

जो सच की राह में अपना लहू बहा बैठे,
उन्हीं को लोग ज़माने में दीवाने कहते हैं।

यहाँ बिकता है ईमान भी दौलत के एवज़,
मगर बाज़ार में इसको बड़े ख़ज़ाने कहते हैं।

किसी मज़लूम की चीख़ें अगर सुनाई दें,
उन्हें अहल-ए-सियासत सिर्फ़ बहाने कहते हैं।

बहुत गुरूर है जिनको महल की ऊँचाई पर,
वही फ़क़ीर को मिट्टी का आशियाने कहते हैं।

किसी के दर्द की क़ीमत नहीं रही अब तो,
मगर किताबों में इंसाँ को सयाने कहते हैं।

‘बाबरा’ तू ज़रा दुनिया की रीत देख यहाँ,
जो सच कहे उसे दुनिया में बेगाने कहते हैं।

- सुशील कुमार ‘बाबरा’
9 घंटे पहले
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