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नज़र पिता की

sushil adlakha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पिता की इस नज़र में
        
                                                    
                            
शायद ही दर्द दिखाई दे तुम्हें
आंख तो नम है मगर
आंसू हैं कि ढलते नहीं ...

हाथ पकड़ कर चलना सिखाया था
आज उन्हीं हाथों को
थामने की हसरत में
उम्र गुज़रती जाती है ...

इन्हीं चाहतों के भंवर में
दिल डूबता उभरता रहता है
क्या मैं जी भर जी सकूंगा
अपने लिए भी कभी...

यह जीवन इक मिथ्या है
मोह माया से लथपथ
पर इस जीवन की इसी राह पर
अपना कर्तव्य तो निभाना है ...

थक जाता हूं अक्सर अब मैं
खुद से उपर उठने की चाह में
क्या पा सकूंगा मैं
अपनी मंज़िल को कभी !? ...

 
एक घंटा पहले
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Shivam Awasthi

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