पिता की इस नज़र में
शायद ही दर्द दिखाई दे तुम्हें
आंख तो नम है मगर
आंसू हैं कि ढलते नहीं ...
हाथ पकड़ कर चलना सिखाया था
आज उन्हीं हाथों को
थामने की हसरत में
उम्र गुज़रती जाती है ...
इन्हीं चाहतों के भंवर में
दिल डूबता उभरता रहता है
क्या मैं जी भर जी सकूंगा
अपने लिए भी कभी...
यह जीवन इक मिथ्या है
मोह माया से लथपथ
पर इस जीवन की इसी राह पर
अपना कर्तव्य तो निभाना है ...
थक जाता हूं अक्सर अब मैं
खुद से उपर उठने की चाह में
क्या पा सकूंगा मैं
अपनी मंज़िल को कभी !? ...
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