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तुम्हें स्मरण कर जीवन भर नित्य नव गीत गढ़ता रहूँगा।

Susheel Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अब प्रकृति के कण-कण में अपनी ही कथा पढ़ता हूँ,
        
                                                    
                            
कहीं तुम्हारी स्मृति की आभा, कहीं अपने मन की व्यथा पढ़ता हूँ।
जो बीत गया, उसे बाँधकर रखने का मोह अब शेष नहीं,
जो प्रेम मिला, उसकी पावनता से बढ़कर कोई संदेश नहीं।
तुम मेरे जीवन में नहीं हो, फिर भी जीवन से विलग कहाँ हो,
तुम दृश्य नहीं, फिर भी मेरी प्रत्येक अनुभूति के सहचर वहाँ हो।
तुम्हारी स्मृति अब आँसू बनकर पलकों पर ठहरती नहीं,
वह शब्द बनकर उतरती है और मौन रहने देती नहीं।
न मिलन की अब अभिलाषा है, न पुनर्मिलन की याचना,
न कोई उलाहना शेष है, न मन में कोई व्यर्थ कामना।
तुम जहाँ रहो, सुखी रहो—यही हृदय का अंतिम विधान है,
तुम्हें मुक्त करके भी तुम्हें प्रेम करना ही अब मेरा सम्मान है।
वर्षों का यह विरह अंततः मुझमें एक स्वर बनकर रहा,
जो कहना था तुमसे कभी, वह मेरी कविता कहती रही।
तुम स्मृति में नहीं केवल—मेरे सृजन में ढले हुए हो,
मेरी नीरव साधना के प्रत्येक अक्षर में पले हुए हो।
तुम गीतों में रचे हुए हो, तुम स्वरों में बसे हुए हो,
मेरे बीते हुए कल से निकलकर मेरे आज में धरे हुए हो।
मैं प्रेम-साधक हूँ—न तुम्हें पाने की कोई अभिलाषा रखता हूँ,
तुम्हारी सुध में प्रतिदिन एक नया गीत रचता हूँ।
जो प्रेम अधूरा रह गया, उसे ही अपनी कविता करता रहूँगा,
तुम्हें स्मरण कर जीवन भर नित्य नव गीत गढ़ता रहूँगा।
-सुशील कुमार सिंह
एक दिन पहले
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